Supreme Court in its recent judgment says that there would be a national anthem session before every movie and people will need to rise (and sing) of course.I am just eager to know whether it's applicable in case of films that are certified Adult as children would be enthusiastic about praising national anthem but will the adults too,that's too before an "A" movie?Well it's good if it's but better if this verdict is a little more clarified.As NOT to where,when or why but as to WHY NOT in places where people gather to make laws and for those who not only just implement something for others but also don't bother to command themselves before media or public eye.And secondly will it improve our moral dignity towards our country precisely paying taxes and not indulging in corruption?We shall be equally eager to see a real clean and green India,not just in imaginery work but with our mortal eyes.Because our national anthem is a really tough one if we value its words with an emotional touch.
Wednesday, 30 November 2016
Thursday, 10 November 2016
वक़्त
हम सब का इस धरती पर अपना अपना समय निश्चित है।हम चाहे भी तो भी उससे न तो कम का जी सकते है न ज्यादा का।अगर ऐसा हो सकता था तो जो लोग मरने की कोशिश करके नाकाम होते है या जो ज्यादा जीने की कोशिश में,उनके साथ उनका मनचाहा सब कुछ होता।मगर इन सब से भी ज्यादा महात्यपूर्ण यह है कि ज़िंदा रहते हुए हम सब जो भी करते है,उसीका फल हमको मिलता रहता है आखड़ी समय तक।जब किसी के साथ बुरा होता है तो लोग कहते है बुरा वक़्त था।किसी के साथ अच्छा हो रहा है तो हम सब कहते है उसका वक़्त अच्छा है।दरअसल हम बार बार झूठ बोलके उस सच्चाई पर पर्दा डालते रहते है कि वक़्त सभी का एक बराबर,फर्क है तो सिर्फ हमारी कर्मों का।सुबह सुबह यह उपदेश!Oh No।उपदेश नहीं है यह,सच्चाई है।वल्कि मैं तो कहती हूँ यह अपना daily का अनुभव है।हम लोग सब दर्शन को जाते है।मंदिर,मस्ज़िद,गिर्जा घरों में।भगवान ढूंढने।जो वहां नहीं वल्कि यहाँ है उसे वहां ढूंढने जाना मतलब वक़्त बर्वाद।सुबह उठके किसी को दो चार गाली देना,बिना कारन के झूठ बोलना,दूसरों से उसका हक़ छीनना,यह सब हम लोगों की परंपरा है।इन्ही के चलते हम अपनी ज़िन्दगी बड़ी धमाके के साथ जीते है।केवल यह सोच कर की ये जो कुछ भी हम कर रहे है इसका ख़बर किसी को नहीं है।कुछ नहीं तो थोड़ा मंदिर चले जाते है।या गंगा में स्नान कर लेने से भी अपनी पापों से छुटकारा मिल ही जायेगी।मगर अफ़सोस!न तो गलत कामों का असर गंगा नहाने से जाता है और न पूजा पाठ से।क्यों की भगवान वहां नहीं,हम सब के अंदर होते है।मगर जब भी हमारे अंदर शैतान घर बनाने लगते है तो भगवान कहीं और छुप जाते है।और फिर वही शैतान हमको अकेला पा कर हमसे सारे गलत काम करवाते है।उसमें से जो जागरूक होते है वो तुरंत उस गलत संगत से मुक्ति पा लेते है।मगर ज्यादातर लोग भ्रम में जीते है।वो एक ऐसा भ्रम जिसका सारा श्रेय अपनी अंदर बैठे अहंकार को जाता है।और देखते ही देखते हमारा मंज़िल तय कर लेता है।कुछ लोग तो इस हद्द तक अँधेरे में जीते है कि उन्हें अपना अंत का कारन भी कोई और ही लगता है।क्यों की उन्हें इस बात का कत्तई पता नहीं की उनसे भी गलतियां हो सकती है।ऐसा पढ़ने लिखने का क्या फ़ायदा जो हमे सच्चे ज्ञान से परिचित न करा सके।
यूँ तो संसार बड़ी विचित्र जगह है।यहाँ हम जो भी करते है,मिलता सिर्फ दुख ही है।क्यों की जो कोई दूसरों के लिए अच्छा काम करे उसको तो दुख ही मिले और जो गलत करे उसका क्या कहना।मगर वास्तव में अगर हम चाहे तो अपनी वक़्त को अपनी मुट्ठी में कर सकते है।इन दिनों कुछ बड़े लोगों के बारे में पढ़ते समय यही महसूस हुआ की काश,इतना सब कुछ दुनिया की बाकि लोगों को पता होता।उनके अपनी जीवन को संचालन करने का उपाय पता होता तो आधी दुनिया की समस्या यूँ ही ख़त्म।मगर ऐसा नहीं है।और क्यों नहीं है?क्यों की हम जानना नहीं चाहते,पढ़ना नहीं चाहते,सुनना नहीं चाहते बस सिर्फ सुनाना चाहते है।दूसरों की भविष्य के बारे में हम में से किसी को कोई हक़ नहीं बनता मगर अपना भविष्य तो अपने ही हाथ में है।उसको क्यों नहीं सुधर सकते हम?क्यों यह सोचना चाहते है जो है ही नहीं।क्यों यह जताने में लगे रहते है जिसको प्रमाणित नहीं कर सकते।हम सबका एक आखड़ी पल लिखा है।वो कब किसके लिए किस वक़्त आएगा पता नहीं।मगर हम सब उस वक़्त तक यह नहीं जान पाएंगे कि हम कहाँ सही और गलत है।सही और गलत का फ़ैसला ऊपरवाले के हाथ में है,सही है।मगर उस फ़ैसले को अपनी हक़ में बदलना सितारों का काम नहीं।यह अफ़सोस की बात है कि कुछ लोग इसको पढ़ने के बाद भी वही सोचते होंगे जो पहले सोच रहे थे।मगर जो इस को पढ़के समझ सकते है उनके लिए मेरी एक ही सलाह है,अपना वक़्त जो की कीमती है,उसे उपन्यास नहीं,बड़े लोगों की ज़िन्दगी के बारे में पढ़के,उनसे सीखो।क्या पता,आपके कर्मों से किसी दिन आप आनेवाली पीढ़ियों को कुछ दे कर जाओ।वक़्त बहुत ही कीमती है।शायद black money से कुछ ज्यादा ही,ऐसा मेरा मानना है।तो अभी से बिना कुछ सोचे पढ़ने लग जाओ।उन लोगों से सीखो जो अपनी ज़िन्दगी से,अपनी अनुभवों से और अपनी कर्मों से माने जाते है,दुनिया भर में पहचाने जाते है।वरना,वक़्त का क्या भरोसा,पता नहीं,कब ख़त्म हो जाये।इससे पहले की वो ख़त्म हो,जल्दी से exchange कर लो।और यह exchange rate एक दम 100% शुद्ध है।क्यों की असली ज्ञान में कोई मिलावट नहीं होता।मेरी बात पर यकीन न आये,खुद आज़मा कर देख लो।ज़िन्दगी सुधर जाएगी।
Tuesday, 8 November 2016
US Elects President,World Waits Anxiously
Trump and his children as well as his supporters are already hyper if he wins but I'm thinking the other way.If he doesn't win,he will probably take drastic decision about his opponent's win.As per his statements in the last debate,he thinks if it goes against him then it's rigged.What an irony of democracy of a country that overpowers million others.A person who has never thought of anything else than himself,then whatever he said in favour of the Americans are nothing but lies.As dollar price is already down if he wins,think what will happen if that worst thing really happens.I have crossed my fingers as nothing else could prove save Hillary at this hour than prayers.