Tuesday, 6 September 2016

एक ख़त मेरे पाकिस्तानी भाइयों के नाम

मेरे पाकिस्तानी भाइयों और बहनों,आज से 69 साल पहले बिभाजन हुए थे,हम लोगों को अलग अलग वतन में बाँट दिया गया था मगर 1971 में बांग्लादेश भी अलग हुए थे फिर भी उनके साथ हमारा ताल्लुक़ात इतने बुरे नहीं है जितना आप लोगों के साथ है।ऐसा क्यों है?

उस समय कुछ नेतायों ने मिलकर हमे बंटा था,आज भी वही सिलसिला जारी है।पर यकीन मानिए ये जो रोज़ रोज़ कश्मीर को लेकर नौटंकी चल रहा है इसमें हम भारत की जनता का कोई लेना देना नहीं है।हमारे रक्षा मंत्री कहते है कि पाकिस्तान जाना और नर्क जाना एक बराबर और वही देश की प्रधान मंत्री बार बार पाकिस्तान जा कर आते हैं।हमारे पूर्व प्रधान मंत्री श्री वाजपेयी जी ने भी कोशिश की दोनों देशों में शांति लाने की।मगर क्यों की कुछ लोगों को खुज़ली करने की आदत है और ये आदत कभी सुधर ही नहीं सकता चाहे कितना ही उन्हें टोका जाए।दरअसल वो चाहते ही है कि हम लोग उनकी ये बातें लेकर उनकी आलोचना करे और इसीसे उन्हें ख़ुशी मिलती है।

गलत है।आलोचना नहीं,उनकी ये सोच।हम तो यही कहेंगे कि इन्हें नज़रअंदाज़ किया जाये।ठीक वैसे ही आप के पाकिस्तानी आर्मी के जनरल भी इसी अंदाज़ से बात करते है।क्यों क्या उन्हें हम जनता मुर्ख नज़र आते है?और मुझे ये भी विस्वास है कि पाकिस्तान में हम जैसे बहुत लोग है जो हमारी तरह शांति रखने में विस्वास रखते है।और अगर ऐसे ही कुछ आवादी इकठ्ठा हो जाये तो क्या किसी भी माय के लाल में इतना दम नहीं जो इस नेकी को तोड़ सके?

जब मैं जी टी रोड पर पाकिस्तान का बस देखा जिसे इंडियन मिलिट्री पोलिस बड़े अनुशासन के साथ ले जा रहे थे तो मेरे आँख भर आये।मुझे मालूम नहीं था उस बस में कौन लोग थे मगर जिस तरह भारतीय सेना ये काम कर रहे थे वो देखने लायक था।हम सारी दुनिया घूम सकते है;नेपाल,भूटान,बांग्लादेश,श्री लंका कहीं भी जा सकते है मगर पाकिस्तान नहीं जा सकते।हमारे गुरूजी कहते है वहां के लोग भी हम जैसे ही है और वहां भी भारत की तरह कई खुबसूरत जगह है।मलाला की क़िताब में उनकी Swat की कहानी से मुझे लगा की वो पाकिस्तान की नहीं,भारत की किसी पहाड़ी शहर की बात कर रही है।मुझे ये समझ में नहीं आता की हमारे नेता लोग ये कौन सी राजनीती खेल रहे है और ये लोग कब तक हमे यूँ ही मुर्ख समझते रहेंगे?

डिजिटल इंडिया,मेक इन इंडिया इन सब के आढ़ में,देश जा रहा है भांड में।मीडिया का गलत प्रभाव भी कुछ कम नहीं है।और कुछ लोग इसके सहारे कुछ भी करते जा रहे है।कुछ कलाकारों ने मिलकर एक अमन की कोशिश की थी जो ज्यादा देर टिंक न सका।जिस राष्ट्रीय राजमार्ग की मैंने बात की वो ढाका से सुरु होकर आप ही के शहर पेशावर में ख़त्म होता है।हमारी फ़ौज भी ज़िन्दगी की बाज़ी लगाते हुए कभी थकते नहीं है।ये दोनों देशों की ही हित में है कि हम एक दूसरें से न लड़े और अपनी अपनी टुकड़ों से खुश रहे।

अगर मेरी ये संवाद आप में से किसी को भी मिलती है तो ज़रा कोशिश करना की आप के वज़ीर-ए-आज़म को जा कर समझाए।वैसेे तो मुझे यकीन है कि वो नहीं समझने वाले,फिर भी कोशिश करने में क्या बुराई है।क्यों की इतना तो पक्का है की बुराई का अंत सिर्फ बुराई से ही होता है।

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